Sunday, 29 April 2007

क्या बनोगे मुन्ना ???

क्या बनोगे मुन्ना ??? दूरदर्शन पर कई साल पहले इस नाम से एक कार्यक्रम आता था...ये वो ज़माना था जब मुन्ना पर डॉक्टर, इंजिनियर या अफ़सर बनने का ही दबाव होता था और ये प्रोग्राम उन मुन्नाओं को इन के अलावा भी कुछ क्षेत्रों के बारे में जानकारी देता था। उस वक्त टी वी पत्रकारिता का इस स्तर पर जन्म नहीं हुआ था. सुनने में (पढ़ने में) शायद ये किसी स्तर पर जन्म लेने वाली बात अजीब लगे लेकिन फ़िलहाल मेरे पास कोई और भाव है नहीं. सत्य यही है कि सत्य अन्वेषी बने टीवी पत्रकार सत्य से कोसों दूर हैं. यदि आज "क्या बनोगे मुन्ना" आ रहा होता तो अवश्य ही बच्चों को भविष्य में टी वी पत्रकारिता से दूर रहने की सलाह देता, या फिर शायद व्यवसायिकता के चलते इसकी जानकारी तो ज़रूर देता लेकिन इस करियर के लिए आवश्यक योग्यताओं के साथ-
1. किसी भी विषय पर घंटों तक अनर्गल बकवास कर सकने की क्षमता.
2. अखबारों से खबर चुरा कर उसे अपनी एक्सक्लूसिव कह कर बेच सकने की क्षमता.
3. पुरूष हों तो सेक्स परिवर्तन करा लेने अथवा नारीयुत् व्यवहार कर सकने की क्षमता.

4. तत्पश्चात बटन खोले रख सकने की क्षमता. ( इसी ब्लॉग पर गर्दन ज्ञान पढ़ें)

5. किसी दुर्घटना के वक्त प्रसन्न रह सकने की क्षमता.

6. नाग, प्रेत और सेक्स के विषयों में पी.एच.डी.

7. अन्य कोई भी क्षमता जो व्यक्ति को आम बुद्धिमान मानव मात्र से अलग करती हो.

सत्यमेव जयते.

Wednesday, 25 April 2007

गर्दन अभी कटी नहीं है.

लोग पूछ रहे हैं कि मैने गले में सर्वाइकल कॉलर क्यों पहना है....
कभी कभी सोचता हूँ कि ये गर्दन की (सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस) की बीमारी मुझे ही क्यों हुई ???
शायद गर्दन झुकना नहीं जानती-इसीलिए...या फिर इधर उधर बहुत घूमती थी-इसलिए.
कारण अनेक हो सकते हैं. ..खैर..
पिछले दिनों कई लोगों की गर्दनें देखने का मौका मिला...भाँति भाँति की गर्दनें- कुछ लंबी सुराहीदार, कुछ मोटी गैंडे की तरह, कुछ न्योता देती, कुछ दूर भगाती और कुछ तो दिखाई ही नहीं देती- ऐसा लगता है जैसे धड़ के ऊपर सर रख दिया गया हो...बीच में कुछ नहीं.- लेकिन अधिकतर लचीली और झुकने को तैयार..। कुछ गर्दनें झुकने से कुछ ज़्यादा भी करने को तैयार...गर्दन के नीचे खुले बटन, कहीं डराने के लिए..कहीं लुभाने के लिए. हर केस में- जितने ज़्यादा खुले बटन, उतनी प्रगति.
और कुछ मेरी तरह-भद्दी सी.. धूप और पसीने में लथपथ घमौंरियों से भरी हुई..काली चीकट...पर अकड़ी हुई गर्दनें. न नीचे खुले बटन..न लचीलापन.

ऐलान किया गया है- ऐसी किसी गर्दन को खुला न छोड़ा जाए....या तो अकड़ निकालने के लिए पट्टा पहनाया जाए या फिर .....काट दिया जाए.

मेरी गर्दन अभी कटी नहीं है.

लंका जीत ली...

न न न...शीर्षक देख कर चकराइए मत. किसी ने लंका नहीं जीती बल्कि -लंका - जीत ली. एशियाई टीमों में अकेली परचम लहराती...सेमीफाइनल की सुरसा को मुंह चिढ़ाते...लंका जीत ली.
और हम क्यों न गर्व करें ..आखिर हम उस टीम से हार कर बाहर निकले थे जो सबको हराते हुए फाइनल तक आ पहुंची. जब सब हार गए तो क्या हम पीछे रह जाते. अगर देश का मीडिया एक हो सकता है तो विश्व की टीमें क्यों नहीं. रही बात बांग्लादेश की तो अब जा रहे हैं न..ढाका. उनको उनके घर में हराएंगेँ. ऐसे ही थोड़ी....और ज़रूरी नहीं है कि हराएँ ही..अब हम लोग 50-50 की जगह 20-20 खेलते है. 50 ओवर तक धूप में खड़े रहना अब हमारे बस की बात नहीं. और 100 ओवर खेल के जीता तो क्या जीता...40 ही ओवर का खेल ठीक है. विज्ञापन के लिए भी वक्त मिल जाएगा. और फिर 100 ओवर खेलें या 40, न्यूज़ चैनलों पर तो कार्यक्रमों की कमी होगी नहीं, बल्कि इस तरह '83 वालों को आराम मिलेगा...और वर्तमान खिलाड़ियों को और पैसा कमाने का मौका.

Tuesday, 24 April 2007

" अब तो शर्म करो". अब तो होश में आओ.

कौन कहता है कि न्यूज़ चैनल अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभा रहे हैं. जागरूकता फैलाना पुराने ज़माने की बात थी. आजकल हुक्म चलाने का दौर है. समाज सुधार का वक्त है. उंगली उठाने का नहीं उंगली करने का वक्त है. बाकियों का पता नहीं पर कभी भी IBN 7 लगा कर देख लें आपको हर वक्त ये पंक्तियां पढ़ने को मिल जाएंगीं- " अब तो शर्म करो". " अब तो होश में आओ." वगैरह वगैरह.
कहीं दंगा हो तो खबर ये नहीं है कि दंगा हुआ बल्कि पुलिस क्या कर रही थी ? अगर रोक रही थी-लाठी भाँज रही थी तो "दरिंदा है पुलिस". अगर लाठी नहीं भाँज रही थी तो " नाकारा है पुलिस".
न्यूज़ चैनल आज ( बगैर अपने गिरेबान में झांके ) देश की पुलिस सुधार रहे हैं . उन्हे कह रहे हैं कि " अब तो शर्म करो". " अब तो होश में आओ. और आप कहते हैं कि पत्रकारिता खत्म हो गई....

Saturday, 21 April 2007

अभिषेक ऐश्वर्या और घोड़ी

अभिषेक ऐश्वर्या की शादी में बेगाने अबदुल्लों को असलियत पता ही नहीं है. घोड़ी का नाम चाँदनी है....और इसे विदेश से लाया गया है. यूरेका के अन्दाज़ में पत्रकार ऐसा चिल्ला रहे थे... सारी जानकारी गलत है.सिर्फ नाम ही ठीक है. सूत्रों के मुताबिक ये घोड़ी सूरत से अपने आशिक के साथ सूरत से भाग के आई थी....यहाँ शादी करना चाहती थी..लेकिन न्यूज़ वाले और संस्कृति वाले पीछे पड़ गए. किसी तरह इज्ज़त बचा कर भागी. वो तो भला हो बच्चन साहब का कि उन्होने पोस्टर में से ही..बेचारी को रोते हुए देख लिया. फटा पोस्टर निकला हीरो....अबला घोड़ी की इज्ज़त बचाने के लिए. वादा किया कि शादी कराएंगे...लेकिन जब उन्हें पता चला कि घोड़े का नाम अबदुल्ला है तो माथे पर बल पड़ना लाज़िमी ही था. लेकिन वादा कर चुके थे और कायस्थ बच्चा एक बार ज़बान दे देता है तो दे देता है.नतीज़ा- अभिषेक ऐश्वर्या की शादी. किसी को कानोकान खबर भी नहीं हुई और चाँदनी और अबदुल्ला की शादी ठाकरे परिवार के सामने करा दी गई. अभिषेक ऐश्वर्या की शादी तो बस बहाना थी. जय हो बच्चनवा..जय हो समाजवाद..