न न न...शीर्षक देख कर चकराइए मत. किसी ने लंका नहीं जीती बल्कि -लंका - जीत ली. एशियाई टीमों में अकेली परचम लहराती...सेमीफाइनल की सुरसा को मुंह चिढ़ाते...लंका जीत ली.
और हम क्यों न गर्व करें ..आखिर हम उस टीम से हार कर बाहर निकले थे जो सबको हराते हुए फाइनल तक आ पहुंची. जब सब हार गए तो क्या हम पीछे रह जाते. अगर देश का मीडिया एक हो सकता है तो विश्व की टीमें क्यों नहीं. रही बात बांग्लादेश की तो अब जा रहे हैं न..ढाका. उनको उनके घर में हराएंगेँ. ऐसे ही थोड़ी....और ज़रूरी नहीं है कि हराएँ ही..अब हम लोग 50-50 की जगह 20-20 खेलते है. 50 ओवर तक धूप में खड़े रहना अब हमारे बस की बात नहीं. और 100 ओवर खेल के जीता तो क्या जीता...40 ही ओवर का खेल ठीक है. विज्ञापन के लिए भी वक्त मिल जाएगा. और फिर 100 ओवर खेलें या 40, न्यूज़ चैनलों पर तो कार्यक्रमों की कमी होगी नहीं, बल्कि इस तरह '83 वालों को आराम मिलेगा...और वर्तमान खिलाड़ियों को और पैसा कमाने का मौका.
Wednesday, 25 April 2007
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1 comment:
Dhaka jakar kya ukhad lange... World cup ki haar to dhakegi nahi...
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