Tuesday, 24 April 2007

" अब तो शर्म करो". अब तो होश में आओ.

कौन कहता है कि न्यूज़ चैनल अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभा रहे हैं. जागरूकता फैलाना पुराने ज़माने की बात थी. आजकल हुक्म चलाने का दौर है. समाज सुधार का वक्त है. उंगली उठाने का नहीं उंगली करने का वक्त है. बाकियों का पता नहीं पर कभी भी IBN 7 लगा कर देख लें आपको हर वक्त ये पंक्तियां पढ़ने को मिल जाएंगीं- " अब तो शर्म करो". " अब तो होश में आओ." वगैरह वगैरह.
कहीं दंगा हो तो खबर ये नहीं है कि दंगा हुआ बल्कि पुलिस क्या कर रही थी ? अगर रोक रही थी-लाठी भाँज रही थी तो "दरिंदा है पुलिस". अगर लाठी नहीं भाँज रही थी तो " नाकारा है पुलिस".
न्यूज़ चैनल आज ( बगैर अपने गिरेबान में झांके ) देश की पुलिस सुधार रहे हैं . उन्हे कह रहे हैं कि " अब तो शर्म करो". " अब तो होश में आओ. और आप कहते हैं कि पत्रकारिता खत्म हो गई....

2 comments:

breakingnews said...

बिल्कुल सही नितिन जी ,
आपने बिल्किल सही फरमाया , अब टीआरपी की जंग में पत्रकारिता पीछे छूट रही है ।लेकिन सभी को ख्याल करना चाहिए , क्योंकि इसके जो सिपहसालार हैं , एक समय में वो पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना एक स्थान बना चुके हैं , कम से कम उन्हें इस बात को तो ध्यान में रखना ही होगा ।
---आबिद नकवी

zooomit said...

Koi fayda nahi..."Hum nahi sudharenge..."